‘ड्राई आई सिंड्रोम’ का मतलब सिर्फ आंखों का सूखापन नहीं है। यह तब होता है जब आंखें पर्याप्त आंसू नहीं बनाती हैं या जब आंसू गुणवत्ताहीन होते हैं और बहुत जल्दी वाष्पित हो जाते हैं। आंसू आंखों को नम रखते हैं, धूल साफ करते हैं और स्पष्ट दृष्टि बनाए रखते हैं। जब यह संतुलन बिगड़ जाता है, तो जलन और सूजन हो सकती है। इस लेख में हम ड्राई आई सिंड्रोम की वजहें और उपाय बता रहे हैं। ड्राई आई सिंड्रोम क्या है ? आंखों को ढकने वाली आंसू की परत तीन परतों से बनी होती है- तेल, पानी और श्लेष्मा। ये परतें मिलकर आंखों की सतह को चिकना और सुरक्षित रखती हैं। जब इनमें से एक भी परत क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो आंसू की परत अस्थिर हो जाती है, जिससे सूखापन आ जाता है।
ड्राई आई के सामान्य लक्षणों में आंखों में चुभन या जलन, लालिमा, पलक झपकाने के बाद धुंधली नजर में सुधार और रोशनी के प्रति संवेदनशीलता शामिल हैं। कई लोगों को आंखों में लगातार कुछ होने का एहसास होता है। कई बार आंखों से बहुत ज्यादा पानी आ सकता है, लेकिन यह एक सहज प्रतिक्रिया है और इससे कोई वास्तविक राहत नहीं मिलती। ड्राई आई सिंड्रोम क्यों होता है ? गलत लाइफस्टाइल ड्राई आई के मामलों के बढ़ने का एक प्रमुख कारण है। स्क्रीन पर लंबे समय तक काम करने से पलक झपकाने की प्राकृतिक दर कम हो जाती है, जिससे आंसू जल्दी सूख जाते हैं और आंखें खुली रह जाती हैं। एयर कंडीशनिंग, प्रदूषण और शुष्क हवा जैसी वजहें वातावरण में नमी को कम करके समस्या को और बदतर बना देते हैं।
उम्र बढ़ने पर बढ़ती है ड्राई आई की समस्या ड्राई आई की समस्या बढ़ने का एक कारण बढ़ती उम्र भी है। उम्र बढ़ने के साथ आंसुओं का उत्पादन कम हो जाता है, जिससे 40 वर्ष की उम्र के बाद ड्राई आई की समस्या आम हो जाती है। महिलाओं को ड्राई आई की समस्या पेरीमेनोपॉज या मेनोपॉज के दौरान यानी 40-50 की उम्र में शुरू होती है। मेनोपॉज के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ने लगता है। लंबे समय तक कॉन्टैक्ट लेंस पहनने और उचित देखभाल न करने पर आंसुओं की परत बाधित हो सकती है, जिससे ड्राई आई की समस्या हो सकती है। एलर्जी, मेंटल हेल्थ खासकर उचित देखभाल न करने पर। एलर्जी, मूड डिसऑर्डर और ब्लडप्रेशर की दवाओं सहित कुछ दवाएं भी आंसुओं के उत्पादन को कम कर सकती हैं।
ड्राई आई सिंड्रोम से किन लोगों को खतरा? ड्राई आई सिंड्रोम की समस्या कई वजहों से हो सकती है, जैसे- स्क्रीन टाइम- ड्राई आई उन लोगों में अधिक आम है जो लंबे समय तक स्क्रीन पर काम करते हैं, क्योंकि वे पलकें कम झपकाते हैं। प्रदूषण- प्रदूषित शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अक्सर आंखों में जलन का सामना करना पड़ता है। प्रेग्नेंसी या मनोपॉज- महिलाओं को खासकर प्रेग्नेंसी या मनोपॉज के दौरान हार्मोनल बदलावों के कारण आंखों में ड्राइनेस बढ़ सकती है।
बढ़ती उम्र- उम्र बढ़ने पर आंसुओं का उत्पादन कम होने के कारण वृद्ध लोगों को इसका अधिक खतरा होता है। कॉन्टैक्ट लेंस- जो लोग लंबे समय तक कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं उन्हें ड्राई आई की समस्या हो सकती है। डायबिटीज और थायराइड- जो लोग डायबिटीज और थायराइड से पीड़ित हैं उन्हें उन्हें आंखों में ड्राइनेस महसूस हो सकती है। सिगरेट की लत- जिन लोगों को सिगरेट पीने की आदत है उन्हें ड्राई आई की समस्या हो सकती है। ड्राई आई सिंड्रोम से कैसे राहत पाएं? ड्राई आई से राहत अक्सर सरल, नियमित बदलावों से शुरू होती है। स्क्रीन का उपयोग करते समय पलकें झपकाना कम न करें। नियमित रूप से पलकें झपकाने से आंसुओं को समान रूप से फैलाने में मदद मिलती है और वे तेजी से वाष्पित नहीं होते। 20-20-20 के नियम से आंखें रिलैक्स रहती हैं, उन्हें आराम मिलता है और आंखों का तनाव कम होता है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से प्राकृतिक रूप से आंसुओं का उत्पादन होता है, जबकि लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स तुरंत आराम प्रदान कर सकती हैं। अपने वातावरण में कुछ बदलाव करके, जैसे पंखे या एयर कंडीशनर से आने वाली सीधी हवा को कम करना और स्क्रीन को आंखों के स्तर से थोड़ा नीचे रखना, आंखों पर पड़ने वाले तनाव को कम किया जा सकता है। सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाएं। स्क्रीन टाइम कंट्रोल करने से आंखों को आराम मिलता है। गर्म सिकाई और पलकों की नियमित सफाई से भी आंसुओं के स्राव में सुधार होता है और आंसुओं की क्वालिटी बेहतर होती है। आंखों की सुरक्षा पर ध्यान दें नॉर्मल देखभाल के बावजूद अगर आंखों में ड्राइनेस बनी रहती है या नजर बार-बार धुंधली होने लगती है, तो आंखों की जांच करवाना जरूरी है। आंखों में लगातार जलन रहने के बावजूद अगर समय पर इलाज न किया जाए तो आंखों में सूजन, जलन, भारीपन का एहसास, खुजली आदि समस्याएं हो सकती हैं। ड्राई आई की समस्या मामूली लग सकती है, लेकिन यह धीरे-धीरे आंखों की रोशनी को प्रभावित कर सकती है। ड्राई आई के शुरुआती लक्षणों को पहचाकर रोज की आदतों में कुछ बदलाव करें। स्क्रीन टाइम कम करने से आंखों का तनाव कम किया जा सकता है। इससे काम पर फोकस बढ़ता है।







