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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला, BMC कमिश्नर अश्विनी भिड़े का वेतन रोका


शहर 04 November 2026
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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला, BMC कमिश्नर अश्विनी भिड़े का वेतन रोका

मुंबई 04 नवंबर। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने बोरीवली स्थित बेस्ट (BEST) बस डिपो के लिए आरक्षित जमीन से अवैध कब्जे नहीं हटाए जाने पर बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिड़े और उनके निजी स्टाफ का वेतन रोकने का आदेश दिया है। इसके साथ ही नगर निगम पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेशों का पालन करना अधिकारियों की जिम्मेदारी है और इसमें लगातार देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी कमिश्नर को अवमानना का कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। अदालत ने पूछा कि पूर्व में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए। इस आदेश के बाद मुंबई के प्रशासनिक महकमे में हलचल तेज हो गई है।

तीन जजों की पीठ ने जताई कड़ी नाराजगी मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की।सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बोरीवली में बस स्टेशन परियोजना के लिए चिह्नित जमीन से अतिक्रमण हटाने के संबंध में पहले भी निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद नगर निगम निर्धारित समय के भीतर कार्रवाई पूरी नहीं कर सका।पीठ ने अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायालय के आदेशों का पालन करने में इस प्रकार की देरी गंभीर विषय है।मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों के बीच संभावित मिलीभगत को लेकर भी सवाल उठाए। हालांकि, यह अदालत की सुनवाई के दौरान व्यक्त की गई आशंका थी, किसी अधिकारी के खिलाफ मिलीभगत का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं।

30 दिन का अतिरिक्त समय देने से इनकार सुनवाई के दौरान बीएमसी की ओर से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय मांगा गया।नगर निगम की ओर से बताया गया कि संबंधित कब्जाधारियों को नोटिस जारी किए गए थे और उनकी सुनवाई भी की गई थी। इसके बाद कुछ लोगों ने दीवानी अदालत में दस्तावेज प्रस्तुत किए। बीएमसी ने दलील दी कि मराठी भाषा में उपलब्ध दस्तावेजों का अंग्रेजी अनुवाद कराने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ। न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया कि महाराष्ट्र में कार्यरत अधिकारियों को मराठी दस्तावेजों के अनुवाद की आवश्यकता के आधार पर इतनी देरी क्यों हो रही है।अदालत ने अतिरिक्त समय देने की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पहले दिए गए आदेशों का तत्काल पालन किया जाए।

कब तक रुका रहेगा अधिकारियों का वेतन? सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी और महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि अदालत के आदेशों का पालन होने तक नगर निगम आयुक्त और उनके निजी स्टाफ का मासिक वेतन जारी नहीं किया जाए।सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने अधिकारियों को 1 दिसंबर 2026 से पहले निर्देशों का पालन करने की चेतावनी दी।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कारण बताओ नोटिस और निर्देशों के अनुपालन से जुड़े प्रश्नों का समाधान होने के बाद ही वेतन जारी करने पर विचार किया जा सकेगा।इस आदेश को सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है बोरीवली की जमीन का पूरा विवाद? यह मामला मुंबई के बोरीवली इलाके में स्थित उस जमीन से जुड़ा है, जिसे BEST बस स्टेशन और उससे संबंधित सुविधाओं के लिए आरक्षित किया गया था।जानकारी के अनुसार, संबंधित भूमि का कुल क्षेत्रफल लगभग 5,800 वर्ग मीटर है। इसमें से करीब 3,400 वर्ग मीटर हिस्सा बस स्टेशन और प्रशासनिक भवन के लिए निर्धारित किया गया था।इस जमीन को लेकर बीएमसी और निजी डेवलपर पराग कंस्ट्रक्शन के बीच लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा है।अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने निजी डेवलपर को संबंधित जमीन का खाली कब्जा नगर निगम को सौंपने का निर्देश दिया था।

इसके बाद बीएमसी को शेष अतिक्रमण हटाने और परियोजना से जुड़े काम पूरे करने थे।हालांकि, निर्धारित अवधि में पूरी जमीन अतिक्रमणमुक्त नहीं हो सकी। इसके कारण सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई। पहले भी दिए जा चुके थे निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने 13 नवंबर 2025 को सुनवाई करते हुए नगर निगम के रवैये पर सवाल उठाए थे।इसके बाद 28 जुलाई 2026 को अदालत ने दोबारा निर्देश जारी करते हुए तीन महीने के भीतर अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा था।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि दीवानी अदालत में लंबित कार्यवाही अपने आप में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई रोकने का आधार नहीं बन सकती, जब तक संबंधित अदालत से प्रभावी रोक का आदेश न हो।

इसके बावजूद निर्धारित समय में कार्रवाई पूरी नहीं होने पर परियोजना से जुड़े पक्ष ने फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।इसी मामले में अदालत ने अब वेतन रोकने, कारण बताओ नोटिस जारी करने और बीएमसी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाने का आदेश दिया है। यह जुर्माना नगर निगम पर लगाया गया है, व्यक्तिगत रूप से कमिश्नर पर नहीं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद शुरू हुई तोड़फोड़ इस मामले में बुधवार, 4 नवंबर की सुबह एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के अगले ही दिन बीएमसी ने बोरीवली पूर्व में अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू कर दिया।नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार, सुबह करीब 7 बजे कार्रवाई शुरू की गई।

इस दौरान कई अनधिकृत दुकानों, झोपड़ियों और व्यावसायिक ढांचों को हटाया गया।अधिकारियों ने दावा किया कि संबंधित भूखंड को अतिक्रमणमुक्त करने की कार्रवाई जल्द पूरी कर ली जाएगी।इस घटनाक्रम से साफ है कि अदालत के आदेश के बाद नगर निगम ने लंबित कार्रवाई में तेजी दिखाई है। हालांकि, पूरी जमीन खाली होने और न्यायालय के निर्देशों का पूर्ण अनुपालन होने की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। सार्वजनिक परियोजनाओं में देरी पर गंभीर सवाल बोरीवली की यह जमीन सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी परियोजना के लिए आरक्षित है। लंबे समय तक अतिक्रमण बने रहने से परियोजना के उपयोग और विकास में बाधा उत्पन्न हुई।मुंबई जैसे महानगर में बस डिपो और परिवहन सुविधाओं के लिए जमीन की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। ऐसे में सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर लंबे समय तक विवाद बने रहना प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश ने यह संदेश दिया है कि न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों का पालन नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारियों से व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय की जा सकती है।

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